Pradhan Mantri Samajik Sahayata Yojana 2026: Major Expansion and Pension Reforms for Persons with Disabilities
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राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम का पुनर्गठन: प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना के तहत दिव्यांग पेंशन नियमों में ऐतिहासिक बदलाव
केंद्र सरकार ने देश के सबसे वंचित, निर्धन और जरूरतमंद नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा कवच प्रदान करने की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण, संवेदनशील और दूरगामी फैसला लिया है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आयोजित केंद्रीय मंत्रिमंडल की उच्चस्तरीय बैठक में राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (National Social Assistance Programme - NSAP) को आगामी पांच वर्षों यानी वित्तीय वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक निरंतर जारी रखने के लिए 53,428 करोड़ रुपये के विशाल वित्तीय परिव्यय को औपचारिक मंजूरी प्रदान कर दी गई है। यह ऐतिहासिक निर्णय न केवल इस राष्ट्रव्यापी कल्याणकारी योजना के स्थायित्व को सुदृढ़ करता है, बल्कि देश के लाखों दिव्यांगजनों, बुजुर्गों, निराश्रित विधवा महिलाओं और आर्थिक संकट से जूझ रहे गरीब परिवारों के जीवन में नई आशा, सुरक्षा और आर्थिक संबल का संचार भी करता है।
इस बड़े पुनर्गठन की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि केंद्र सरकार ने अब इस संपूर्ण योजना का नाम बदलकर प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना (PMSSY) करने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही योजना के विभिन्न घटकों और पेंशन श्रेणियों के नामों का भी नया नामकरण किया गया है ताकि योजनाओं का स्वरूप अधिक स्पष्ट और केंद्रित हो सके। सबसे क्रांतिकारी और स्वागतयोग्य बदलाव दिव्यांगता पेंशन योजना के पात्रता नियमों, आयु सीमा और वित्तीय सहायता की मासिक दरों में किया गया है। 15 अगस्त 1995 को शुरू किया गया यह ऐतिहासिक सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम अब अपने नए स्वरूप में पहले से कहीं अधिक व्यापक, समावेशी और मानवीय बनकर उभरा है। प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC, SSC, State PSCs) की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों तथा लोक नीति के शोधकर्ताओं के लिए इस सरकारी फैसले के सभी सामाजिक, संवैधानिक और आर्थिक पहलुओं को समझना अत्यंत आवश्यक है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी और 53,428 करोड़ रुपये के वित्तीय आवंटन का समग्र विश्लेषण
केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित 53,428 करोड़ रुपये का भारी-भरकम वित्तीय आवंटन भारत सरकार की उस अटूट प्रतिबद्धता को सिद्ध करता है जिसमें समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक बिना किसी बाधा के सामाजिक न्याय और आर्थिक सहायता पहुंचाना सर्वोच्च प्राथमिकता है। यह योजना भारतीय संविधान के राज्य के नीति निदेशक तत्वों (Directive Principles of State Policy), विशेष रूप से अनुच्छेद 41 के संवैधानिक अधिदेश को धरातल पर साकार करने की दिशा में एक अत्यंत सशक्त माध्यम है। संविधान का अनुच्छेद 41 राज्य को यह निर्देश देता है कि वह अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर बेरोजगारी, बुढ़ापे, बीमारी, दिव्यांगता और अन्य अनर्ह अभाव की स्थितियों में लोक सहायता पाने के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी प्रावधान करे।
आगामी पांच वर्षों (2026-27 से 2030-31) के लिए स्वीकृत यह वित्तीय राशि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को केंद्रीय सहायता के रूप में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (Direct Benefit Transfer - DBT) प्रणाली के माध्यम से उपलब्ध कराई जाएगी। इससे देश भर के करोड़ों निर्धन परिवारों को नियमित आय सहायता सुनिश्चित होगी। यह सहायता केवल कागजी आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से गंभीर आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवारों को दैनिक जीवन के बुनियादी पोषण, स्वास्थ्य जांच, जीवन रक्षक दवाओं और आवश्यक चिकित्सीय देखभाल की लागत वहन करने में सीधी मदद मिलेगी।
दिव्यांगजन पेंशन नियमों में हुए युगांतरकारी सुधार
संशोधित योजना के अंतर्गत दिव्यांगजनों के अधिकारों, उनकी गरिमा और दैनिक जीवन की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए नियमों में बुनियादी और अभूतपूर्व परिवर्तन किए गए हैं। दशकों से चली आ रही कठोर प्रशासनिक शर्तों और विसंगतियों को शिथिल करते हुए अब इसे एक संवेदनशील और वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान किया गया है, जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
दिव्यांगता प्रतिशत की सीमा 80 प्रतिशत से घटाकर 40 प्रतिशत की गई
- पूर्ववर्ती नियम: पहले लागू व्यवस्था के तहत केंद्रीय दिव्यांगता पेंशन का लाभ केवल उन्हीं व्यक्तियों को प्रदान किया जाता था जो 80 प्रतिशत या उससे अधिक गंभीर दिव्यांगता (Severe Disability) से ग्रस्त थे। इसके कारण लाखों ऐसे व्यक्ति सहायता से वंचित रह जाते थे जो 40 से 79 प्रतिशत के बीच दिव्यांग थे और अपनी दैनिक आजीविका कमाने में असमर्थ थे।
- संशोधित नियम: नए सुधारों के अंतर्गत अब मानक दिव्यांगता (Benchmark Disability) की सीमा को घटाकर मात्र 40 प्रतिशत कर दिया गया है।
- कानूनी सामंजस्य: भारत सरकार के 'दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016' (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016) के तहत 40 प्रतिशत या उससे अधिक दिव्यांगता को कानूनी रूप से बेंचमार्क दिव्यांगता माना जाता है। मंत्रिमंडल के इस ताजा फैसले ने अब केंद्रीय पेंशन योजना को इस प्रगतिशील कानून के मानकों के साथ पूरी तरह एकीकृत और सुसंगत बना दिया है।
- व्यापक प्रभाव: इस नीतिगत बदलाव से देश भर के लाखों ऐसे मध्यम रूप से दिव्यांग नागरिक सीधे तौर पर सामाजिक सुरक्षा के दायरे में आ सकेंगे, जो अब तक कठोर प्रतिशत सीमा के कारण लाभ प्राप्त करने से वंचित रह जाते थे।
न्यूनतम आयु सीमा की शर्त समाप्त: अब जन्म के समय से ही मिलेगा लाभ
- पुराने नियमों की कमी: पुराने प्रावधानों के तहत दिव्यांगता पेंशन प्राप्त करने के लिए न्यूनतम आयु सीमा 18 वर्ष निर्धारित थी। इस नियम की सबसे बड़ी विसंगति यह थी कि 18 वर्ष से कम आयु के दिव्यांग बच्चों और उनके गरीब माता-पिता को किसी भी प्रकार की केंद्रीय आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं हो पाती थी।
- ऐतिहासिक संशोधन: नए नियमों में न्यूनतम आयु मानदंड को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। अब दिव्यांग पेंशन पात्रता जन्म के समय से ही लागू मानी जाएगी।
- व्यावहारिक लाभ: इसका सीधा अर्थ यह है कि जैसे ही किसी नवजात शिशु या बालक में अधिकृत चिकित्सा बोर्ड द्वारा 40 प्रतिशत बेंचमार्क दिव्यांगता प्रमाणित होगी, उसके भरण-पोषण, विशेष पोषण, फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और आवश्यक सहायक उपकरणों की व्यवस्था हेतु परिवार को मासिक पेंशन का लाभ मिलना तत्काल प्रारंभ हो जाएगा। यह सुधार बच्चों के प्रारंभिक विकास में मील का पत्थर सिद्ध होगा।
मासिक वित्तीय सहायता दरों में वृद्धि
- 79 वर्ष तक की आयु के लाभार्थी: संशोधित दरों के अंतर्गत 79 वर्ष तक की आयु वाले सभी पात्र दिव्यांग लाभार्थियों के लिए केंद्रीय सहायता की दर को बढ़ाकर 375 रुपये प्रति माह कर दिया गया है।
- 80 वर्ष या उससे अधिक आयु के लाभार्थी: 80 वर्ष अथवा उससे अधिक आयु के अति-वरिष्ठ दिव्यांग नागरिकों के लिए यह राशि बढ़ाकर 625 रुपये प्रति माह निर्धारित की गई है।
- राज्यों का अंशदान: यह राशि केंद्र सरकार द्वारा प्रत्यक्ष रूप से दी जाने वाली मूल सहायता है। इसके अतिरिक्त, अधिकांश राज्य सरकारें अपने बजट से इसमें महत्वपूर्ण अतिरिक्त टॉप-अप राशि जोड़ती हैं, जिससे वास्तविक रूप से लाभार्थी को प्राप्त होने वाली कुल मासिक सहायता राशि कई गुना बढ़ जाती है।
दिशानिर्देशों के क्रियान्वयन की समय-सीमा
- केंद्र सरकार के आधिकारिक वक्तव्य में यह स्पष्ट किया गया है कि दिव्यांग पेंशन योजना के संशोधित पात्रता मानदंड, नए लाभार्थियों के चयन की रूपरेखा और सहायता की नई दरों के क्रियान्वयन से संबंधित विस्तृत प्रशासनिक दिशा-निर्देश अगले तीन महीने के भीतर जारी और प्रभावी कर दिए जाएंगे।
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योजनाओं का नया नामकरण और प्रशासनिक संरचना
राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के अंतर्गत संचालित विभिन्न उप-योजनाओं के प्रशासनिक ढांचे और पहचान को अधिक सुसंगत बनाने के लिए इनके नामों में व्यापक संशोधन किया गया है। अब यह संपूर्ण कार्यक्रम राष्ट्रीय स्तर पर 'प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना' के नाम से जाना जाएगा। इसके प्रमुख घटकों का पुनर्गठित स्वरूप निम्नलिखित है:
- प्रधानमंत्री वृद्धावस्था पेंशन योजना: पूर्व में इसे 'इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना' (IGNOAPS) के नाम से जाना जाता था। अब इसका नया नाम प्रधानमंत्री वृद्धावस्था पेंशन योजना कर दिया गया है। इसके तहत गरीबी रेखा से नीचे (BPL) जीवन यापन करने वाले 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों को नियमित पेंशन प्रदान की जाती है।
- प्रधानमंत्री विधवा पेंशन योजना: पूर्ववर्ती 'इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना' (IGNWPS) को अब नया नाम प्रधानमंत्री विधवा पेंशन योजना दिया गया है। यह योजना 40 से 79 वर्ष की आयु वर्ग की बीपीएल विधवा महिलाओं को गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती है।
- प्रधानमंत्री दिव्यांगजन पेंशन योजना: पूर्व की 'इंदिरा गांधी राष्ट्रीय दिव्यांगता पेंशन योजना' (IGNDPS) का नाम बदलकर अब प्रधानमंत्री दिव्यांगजन पेंशन योजना कर दिया गया है। दिव्यांगता प्रतिशत में छूट और जन्म से पात्रता के सभी ऐतिहासिक संशोधन इसी योजना के अंतर्गत समाहित किए गए हैं।
- प्रधानमंत्री परिवार लाभ योजना: पूर्व में 'राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना' (NFBS) के नाम से संचालित इस घटक को अब प्रधानमंत्री परिवार लाभ योजना नाम दिया गया है। इसके अंतर्गत निर्धन बीपीएल परिवार के मुख्य कमाने वाले सदस्य (पुरुष अथवा महिला) की असामयिक मृत्यु हो जाने पर पीड़ित परिवार को एकमुश्त वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है ताकि परिवार आर्थिक तबाही से बच सके।
यह रेखांकित करना अत्यंत प्रासंगिक है कि जहां दिव्यांगजन पेंशन घटक में व्यापक पात्रता और वित्तीय सुधार किए गए हैं, वहीं वृद्धजनों और विधवाओं के लिए संचालित पेंशन योजनाओं तथा परिवार लाभ योजना के मूल पात्रता स्वरूप और मौजूदा नियमों को यथावत निरंतर रखा गया है।
राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) का ऐतिहासिक विकास क्रम
भारत में कल्याणकारी राज्य और सामाजिक सुरक्षा के विकास का अध्ययन करते समय राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम की ऐतिहासिक यात्रा को समझना अत्यंत ज्ञानवर्धक है। इस योजना की रूपरेखा समय के साथ बदलती सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप निरंतर परिष्कृत होती रही है:
- 15 अगस्त 1995: भारत के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर तत्कालीन केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत की गई। प्रारंभ में इसके तीन प्रमुख घटक थे: राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (NOAPS), राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना (NFBS) और राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना (NMBS)।
- वर्ष 2001-2002: सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के युक्तिकरण के तहत राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के जननी सुरक्षा योजना कार्यक्रम में समाहित कर दिया गया, जिससे मातृ स्वास्थ्य पर अधिक प्रभावी ध्यान दिया जा सके।
- वर्ष 2007: वृद्धावस्था पेंशन योजना का विस्तार करते हुए इसे बीपीएल परिवारों के उन सभी वरिष्ठ नागरिकों के लिए अनिवार्य किया गया जिनकी आयु 65 वर्ष थी, तथा इसका नामकरण इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना किया गया।
- वर्ष 2009: सामाजिक सुरक्षा के दायरे को और अधिक समावेशी बनाने के लिए फरवरी 2009 में दो नए घटक जोड़े गए: इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना (विधवाओं हेतु) और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय दिव्यांगता पेंशन योजना (गंभीर दिव्यांगजनों हेतु)।
- वर्ष 2011: वृद्धावस्था पेंशन के लिए पात्रता आयु को 65 वर्ष से घटाकर 60 वर्ष कर दिया गया, जिससे करोड़ों नए वृद्ध नागरिकों को इस सुरक्षा चक्र में शामिल होने का अवसर प्राप्त हुआ।
- वर्ष 2026: केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 53,428 करोड़ रुपये की पांच वर्षीय निरंतरता और दिव्यांग पेंशन नियमों में व्यापक उदारीकरण का यह ताजा फैसला इस तीन दशक पुराने कार्यक्रम का अब तक का सबसे प्रगतिशील, समावेशी और युगांतरकारी सुधार माना जा रहा है।
सामाजिक, आर्थिक एवं विकासात्मक दृष्टिकोण से इस नीतिगत निर्णय का महत्व
प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना के तहत किए गए इन सुधारों के बहुआयामी सामाजिक, आर्थिक और विकासात्मक प्रभाव देश के समग्र विकास पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होंगे:
- समावेशी विकास और सामाजिक गरिमा: दिव्यांगता की न्यूनतम अर्हता को 80 प्रतिशत से घटाकर 40 प्रतिशत करने से ग्रामीण भारत और पिछड़े शहरी क्षेत्रों में रह रहे वे असहाय नागरिक अब मुख्यधारा से जुड़ सकेंगे जो अपनी शारीरिक या मानसिक सीमाओं के कारण आजीविका अर्जित करने में अक्षम थे। इससे उनके भीतर आत्मसम्मान की भावना जागृत होगी और वे अपने परिवार अथवा समाज पर स्वयं को बोझ नहीं समझेंगे।
- प्रारंभिक बाल हस्तक्षेप (Early Childhood Intervention): जन्म के समय से ही दिव्यांग पेंशन की पात्रता मिलना बाल अधिकारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से एक क्रांतिकारी कदम है। प्रारंभिक बाल्यावस्था में विशेष पोषण, स्पीच थेरेपी, सहायक उपकरण और नियमित चिकित्सकीय परामर्श की अत्यंत आवश्यकता होती है। निर्धन परिवारों के पास इन बुनियादी चिकित्सकीय आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते थे। जन्म से वित्तीय सहायता मिलने से बच्चों के प्रारंभिक विकास में सुधार होगा और उनकी भविष्य की निर्भरता काफी हद तक कम हो सकेगी।
- पारदर्शिता और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT): यह पूरी योजना आधार-संबद्ध प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) और सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (PFMS) के माध्यम से डिजिटल रूप से संचालित की जाएगी। इससे सरकारी तंत्र में बिचौलियों, दलालों और फर्जीवाड़े की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी तथा सहायता राशि शत-प्रतिशत पारदर्शिता के साथ सीधे लाभार्थियों के बैंक अथवा डाकघर खातों में पहुंचेगी।
- लैंगिक और सामाजिक न्याय: ग्रामीण क्षेत्रों में दिव्यांग बालिकाओं और महिलाओं की स्थिति सामान्यतः अधिक संवेदनशील होती है। इस योजना के माध्यम से मिलने वाली वित्तीय सुरक्षा उन्हें अपने परिवारों में बेहतर देखभाल, पोषण और सम्मानजनक स्थिति दिलाने में सहायक सिद्ध होगी।
समसामयिक घटनाक्रम विशेष प्रश्नोत्तरी (Current Affairs FAQ)
प्रश्न 1: केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) को किस अवधि तक जारी रखने के लिए कितने रुपये का बजट स्वीकृत किया गया है?
संक्षिप्त उत्तर: वित्तीय वर्ष 2026-27 से 2030-31 (कुल पांच वर्षों) के लिए 53,428 करोड़ रुपये का व्यय स्वीकृत किया गया है।
विस्तृत उत्तर: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सामाजिक सुरक्षा तंत्र को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम को वित्तीय वर्ष 2026-27 से प्रारंभ करके वित्तीय वर्ष 2030-31 तक कुल पांच वर्षों की समयावधि के लिए निरंतर जारी रखने की मंजूरी दी है। इसके प्रभावी क्रियान्वयन, प्रशासनिक प्रबंधन और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से देश भर के जरूरतमंद लाभार्थियों तक पेंशन पहुंचाने हेतु केंद्र सरकार द्वारा कुल 53,428 करोड़ रुपये के भारी वित्तीय परिव्यय का प्रावधान किया गया है।
प्रश्न 2: राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम का नया नाम क्या रखा गया है और इसके घटकों के नाम में क्या परिवर्तन हुए हैं?
संक्षिप्त उत्तर: योजना का नया नाम 'प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना' रखा गया है और इसके सभी पेंशन घटकों का नामकरण प्रधानमंत्री के नाम पर किया गया है।
विस्तृत उत्तर: केंद्र सरकार के आधिकारिक निर्णय के अनुसार संपूर्ण कार्यक्रम का नाम बदलकर प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना (PMSSY) कर दिया गया है। इसके अंतर्गत संचालित सभी प्रमुख उप-योजनाओं का नामकरण भी परिवर्तित किया गया है: इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन का नाम 'प्रधानमंत्री वृद्धावस्था पेंशन योजना', इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन का नाम 'प्रधानमंत्री विधवा पेंशन योजना', इंदिरा गांधी राष्ट्रीय दिव्यांगता पेंशन का नाम 'प्रधानमंत्री दिव्यांगजन पेंशन योजना' और राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना का नाम बदलकर 'प्रधानमंत्री परिवार लाभ योजना' कर दिया गया है।
प्रश्न 3: प्रधानमंत्री दिव्यांगजन पेंशन योजना के अंतर्गत मानक दिव्यांगता प्रतिशत में क्या ऐतिहासिक बदलाव किया गया है?
संक्षिप्त उत्तर: पेंशन पात्रता हेतु दिव्यांगता की न्यूनतम सीमा को 80 प्रतिशत से घटाकर 40 प्रतिशत कर दिया गया है।
विस्तृत उत्तर: पूर्ववर्ती नियमों के अनुसार दिव्यांगता पेंशन प्राप्त करने के लिए लाभार्थी का कम से कम 80 प्रतिशत गंभीर रूप से दिव्यांग होना अनिवार्य था, जिसके कारण देश के लाखों मध्यम दिव्यांगजन (40 से 79 प्रतिशत तक) आर्थिक सहायता के लाभ से वंचित रह जाते थे। केंद्रीय मंत्रिमंडल के नए निर्णय के तहत इस मानक को घटाकर 40 प्रतिशत बेंचमार्क दिव्यांगता कर दिया गया है। यह संशोधन दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के कानूनी प्रावधानों के साथ पूर्ण सामंजस्य स्थापित करता है और लाभार्थियों के दायरे को व्यापक बनाता है।
प्रश्न 4: संशोधित नियमों के अनुसार दिव्यांगता पेंशन के लिए न्यूनतम आयु सीमा और संशोधित मासिक वित्तीय दरें क्या निर्धारित की गई हैं?
संक्षिप्त उत्तर: न्यूनतम आयु सीमा अब जन्म के समय से लागू होगी; 79 वर्ष की आयु तक 375 रुपये प्रति माह और 80 वर्ष या अधिक पर 625 रुपये प्रति माह मिलेंगे।
विस्तृत उत्तर: पुराने प्रावधानों के तहत दिव्यांग पेंशन पाने के लिए न्यूनतम 18 वर्ष की आयु होना अनिवार्य था, जिसे अब समाप्त करते हुए जन्म के समय से ही पात्र बना दिया गया है। संशोधित वित्तीय दरों के तहत 79 वर्ष तक की आयु वाले सभी पात्र दिव्यांग लाभार्थियों को 375 रुपये प्रति माह तथा 80 वर्ष अथवा उससे अधिक आयु के अति-वरिष्ठ दिव्यांग नागरिकों को 625 रुपये प्रति माह की दर से केंद्रीय सहायता राशि सीधे बैंक खातों में प्रदान की जाएगी।
प्रश्न 5: राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) मूल रूप से कब शुरू हुआ था और इसका संवैधानिक आधार क्या है?
संक्षिप्त उत्तर: यह कार्यक्रम 15 अगस्त 1995 को शुरू किया गया था और इसका संवैधानिक आधार भारतीय संविधान का अनुच्छेद 41 है।
विस्तृत उत्तर: देश के अत्यंत निर्धन और बेसहारा परिवारों को न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम की शुरुआत 15 अगस्त 1995 को स्वतंत्रता दिवस पर की गई थी। यह कार्यक्रम भारतीय संविधान के भाग 4 में उल्लेखित राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अनुच्छेद 41 से प्रत्यक्ष रूप से प्रेरित है, जो राज्य को वृद्धावस्था, बीमारी, अक्षमता और अन्य अभावग्रस्त परिस्थितियों में लोक सहायता उपलब्ध कराने का निर्देश देता है।
निष्कर्ष और नीतिगत दृष्टिकोण
प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना के रूप में राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम का व्यापक कायाकल्प भारत के लोक कल्याणकारी राज्य के संकल्प को धरातल पर चरितार्थ करने वाला एक अत्यंत साहसिक और मानवीय कदम है। विशेष रूप से दिव्यांगजनों के लिए पात्रता मानक को 80 प्रतिशत से घटाकर 40 प्रतिशत करना, न्यूनतम आयु सीमा को पूरी तरह समाप्त कर जन्म से ही पेंशन का अधिकार देना और वित्तीय दरों में वृद्धि करना भारतीय सामाजिक सुरक्षा नीति में एक युगांतरकारी मोड़ है। 53,428 करोड़ रुपये का दीर्घकालिक बजटीय आवंटन यह सुनिश्चित करता है कि निर्धनता और शारीरिक अक्षमता कभी भी किसी नागरिक के सम्मानजनक जीवन और बुनियादी अधिकारों के आड़े नहीं आएगी। यह सुधार आने वाले वर्षों में सामाजिक न्याय, समावेशी विकास और गरीबी उन्मूलन के राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में मील का पत्थर सिद्ध होगा।
केंद्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना के तहत दिव्यांग पेंशन नियमों में किए गए इस ऐतिहासिक बदलाव पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि राज्यों द्वारा इसमें और अधिक अंशदान जोड़कर न्यूनतम पेंशन को और बढ़ाया जाना चाहिए? अपने विचार हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर अवश्य बताएं। यदि आपको यह विस्तृत समसामयिक विश्लेषण उपयोगी और ज्ञानवर्धक लगा हो, तो इस पोस्ट को लाइक करने के लिए थम्स अप (Thumbs Up) जरूर दें और अपने दोस्तों व प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे सहपाठियों के साथ शेयर करना न भूलें!
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